Friday, 11 November 2016

ये है देश के दो बड़े महान देशभक्तों की कहानी....विवरण जानिये.....

भगत सिंह के खिलाफ विरुद्ध गवाही देने वाले दो व्यक्ति कौन थे ?
जब दिल्ली में भगत सिंह पर अंग्रेजों की अदालत में असेंबली में बम फेंकने का मुकद्दमा चला तो...
👉 भगत सिंह और उनके साथी बटुकेश्वर दत्त के खिलाफ शोभा सिंह ने गवाही दी और दूसरा गवाह था शादी लाल !
👉 दोनों को वतन से की गई इस गद्दारी का इनाम भी मिला। दोनों को न सिर्फ सर की उपाधि दी गई बल्कि और भी कई दूसरे फायदे मिले।
👉 शोभा सिंह को दिल्ली में बेशुमार दौलत और करोड़ों के सरकारी निर्माण कार्यों के ठेके मिले आज कनौट प्लेस में सर शोभा सिंह स्कूल में कतार लगती है बच्चो को प्रवेश नहीं मिलता है जबकि
👉 शादी लाल को बागपत के नजदीक अपार संपत्ति मिली। आज भी श्यामली में शादी लाल के वंशजों के पास चीनी मिल और शराब कारखाना है।
👉 सर शादीलाल और सर शोभा सिंह, भारतीय जनता कि नजरों मे सदा घृणा के पात्र थे और अब तक हैं?
👉 लेकिन शादी लाल को गांव वालों का ऐसा तिरस्कार झेलना पड़ा कि उसके मरने पर किसी भी दुकानदार ने अपनी दुकान से कफन का कपड़ा तक नहीं दिया।
👉 शादी लाल के लड़के उसका कफ़न दिल्ली से खरीद कर लाए तब जाकर उसका अंतिम संस्कार हो पाया था।
👉शोभा सिंह खुशनसीब रहा। उसे और उसके पिता सुजान सिंह (जिसके नाम पर पंजाब में कोट सुजान सिंह गांव और दिल्ली में सुजान सिंह पार्क है) को राजधानी दिल्ली समेत देश के कई हिस्सों में हजारों एकड़ जमीन मिली और खूब पैसा भी।
👉 शोभा सिंह के बेटे खुशवंत सिंह ने शौकिया तौर पर पत्रकारिता शुरु कर दी और बड़ी-बड़ी हस्तियों से संबंध बनाना शुरु कर दिया।
👉सर शोभा सिंह के नाम से एक चैरिटबल ट्रस्ट भी बन गया जो अस्पतालों और दूसरी जगहों पर धर्मशालाएं आदि बनवाता तथा मैनेज करता है।
👉 आज दिल्ली के कनॉट प्लेस के पास बाराखंबा रोड पर जिस स्कूल को मॉडर्न स्कूल कहते हैं वह शोभा सिंह की जमीन पर ही है और उसे सर शोभा सिंह स्कूल के नाम से जाना जाता था।
👉 खुशवंत सिंह ने अपने संपर्कों का इस्तेमाल कर अपने पिता को एक देशभक्त दूरद्रष्टा और निर्माता साबित करने की भरसक कोशिश की।
👉 खुशवंत सिंह ने खुद को इतिहासकार भी साबित करने की भी कोशिश की और कई घटनाओं की अपने ढंग से व्याख्या भी की।
👉 खुशवंत सिंह ने भी माना है कि उसका पिता शोभा सिंह 8 अप्रैल 1929 को उस वक्त सेंट्रल असेंबली मे मौजूद था जहां भगत सिंह और उनके साथियों ने धुएं वाला बम फेंका था।
👉 बकौल खुशवंत सिह, बाद में शोभा सिंह ने यह गवाही दी, शोभा सिंह 1978 तक जिंदा रहा और दिल्ली की हर छोटे बड़े आयोजन में वह बाकायदा आमंत्रित अतिथि की हैसियत से जाता था।
👉 खुशवंत सिंह का ट्रस्ट हर साल सर शोभा सिंह मेमोरियल लेक्चर भी आयोजित करवाता है जिसमे बड़े-बड़े नेता और लेखक अपने विचार रखने आते हैं,
और...
👉 बिना शोभा सिंह की असलियत जाने (य़ा फिर जानबूझ कर अनजान बने) उसकी तस्वीर पर फूल माला चढ़ा आते हैं
👉आज़ादी के दीवानों क विरुद्ध और भी गवाह थे ।
1. शोभा सिंह
2. शादी राम
3. दिवान चन्द फ़ोर्गाट
4. जीवन लाल
5. नवीन जिंदल की बहन के पति का दादा
6. भूपेंद्र सिंह हुड्डा का दादा
👉दीवान चन्द फोर्गाट DLF कम्पनी का Founder था इसने अपनी पहली कालोनी रोहतक में काटी थी
👉इसकी इकलौती बेटी थी जो कि K.P.Singh को ब्याही और वो मालिक बन गया DLF का ।
👉अब K.P.Singh की भी इकलौती बेटी है जो कि कांग्रेस के नेता और गुज्जर से गुलाम नबी आज़ाद के बेटे सज्जाद नबी आज़ाद के साथ ब्याही गई है । अब वह DLF का मालिक बनेगा ।
👉जीवन लाल मशहूर एटलस साईकल कम्पनी का मालिक था।
अब सार समझिये
भारत में कभी भी अंत अंजाम और लक्ष्य प्राप्ति नहीं देखा जाता था तो देखा जाता था की उस लक्ष्य को किसी ने कैसे प्राप्त किया कैसे पहुँच उस अंजाम को अंजाम कैसे दिया गया न की वह अंजाम दे पाया।
ऐसे ही भारत और पाकिस्तान के लोग हुआ करते थे.
भररत और पाकिस्तान के लोगों में मूल्य था संस्कार था चरित्र और उसे निभाने की मर्यादा थी. अपार शक्ति थी की वह मुसीबतों को झेल कर उससे बाहर निकल सकें। वो कमज़ोर बुज़दिल नहीं थे की अपना समय और स्वार्थ देख कर चरित्र बदल देते अपनी मर्यादा खो देते झूठ और फरेब का सहारा ले लेते
बर्तानवी शासन ने भारतीयों की मति भ्रष्ट कर दी.
अब लोग यह देखते हैं की व्यक्ति अंजाम पर पहुंचा या नहीं लक्ष्य प्राप्त किया या नहीं यह नहीं की वह लक्ष्य पर कैसे पहुंचा?
उसका रास्ता चोरी का था डकैती का था झूठ का था फरेब का था दगा का था या धोखा का यह अब मायने रखना बंद कर दिया
भारत में लोग राणा प्रताप को आज इसीसलिए पूजते हैं क्योंकि राणा प्रताप की विधि, उनका रास्ता सच्चा था इतनी धोखे मिले उन्हें , उनका चरित्र ज़रा भी नहीं डगमगाया इतनी समस्याएं आईं पर वो ज़रा भी विचलित नहीं हुए. तभी तो राणा प्रताप की मूर्तियां सभी स्थानों पर मिलती हैं अकबर की नहीं।
अकबर की लक्ष्य प्राप्ति में धोखा, दाग और फरेब था अहंकार था. वह व्यावहारिक था शायद
पर राणा प्रताप हार कर भी जीत गए अकबर जीत कर भी हार गए।
आज भी हमारी मानसिकता ऐसी है जैसे की लक्ष्य ही सब कुछ हो चाहे उसके लिए कितना भी नीचे क्यों न गिरना पड़े कुछ भी क्यों न करना पड़े
चोरी से पैसे कमाए हुए व्यक्ति को "मान सम्मान" से देखा जाता है और पर जिसने अपनी अस्मिता अक्षुण्ण रखी जिस व्यक्ति ने अपने चरित्र को मिसाल बनाया वह अब ग्लैमरस नहीं रह गया
चरित्रहीनता से पाया लक्ष्य ग्लमौरौस है, फरेब फैशन है धोखा देना जीवन की रीत है चोरी करना स्मार्टनेस है
मान सम्मान में अब वह ग्लैमर नहीं जो चोरी से कमाए हुए पैसे में है, जो "स्मार्ट" बनकर लोगों को धोखा देने में है
क्या यही हम भारतीयों का चरित्र है ? क्या यही हमारी थाती है? क्या यही हमारी पहचान है? क्या यही हमारी निधि है? क्या यही हमारी अस्मिता है?

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